
वर्षा से नरम हुए पथ और आषाढ़ पूर्णिमा की शांति
जैसे-जैसे अरण्य संघाराम के जंगलों में जुलाई के महीने में वर्षा ऋतु ने ज़ोर पकड़ा, उसके साथ-साथ एक शांत वातावरण की अनुभूति गहराई – वर्षा ने न केवल धरती को नरम कर दिया बल्कि दिलों में भी विनम्रता को उजागर किया | आषाढ़ की पूर्णिमा, जिसे गुरु पूर्णिमा के नाम से जाना जाता है, भगवान बुद्ध के अनुयायियों के लिए बहुत महत्व रखती है, क्योंकि इस दिन को भगवान बुद्ध के द्वारा दिए गए अपने पहले प्रवचन और संघ की स्थापना के लिए उनके प्रति अपना सम्मान प्रकट करने के रूप में मनाया जाता है |
यह महीना सामूहिक अभ्यास, सेवा और आपसी मेलजोल के रूप में व्यतीत हुआ।
🌕 आषाढ़ / गुरु पूर्णिमा : एक पूर्णिमा और ढेर सारी भेंट
आषाढ़ पूर्णिमा के अवसर पर श्रद्धा के क्षण
१० जुलाई, बृहस्पतिवार का दिन आषाढ़ पूर्णिमा (जो कि गुरु पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है) के रूप में मनाया गया | यह दो चीज़ों के लिए महत्वपूर्ण है। थेरवाद परम्परा में यह दिन भगवान की धम्मचक्क-पवत्तन सुत्त की शिक्षा को याद करते हुए मनाया जाता है, जब धर्म की शिक्षाओं का पहला उद्घोष हुआ। भारत के कुछ भागों में यह दिन अपने गुरुओं को सम्मान देने का या गुरु वन्दन का अवसर होता है । इसी लहर में यह दिन पूर्णता में तब्दील हुआ : भगवान बुद्ध और उनके साथ उन सभी के लिए कृतज्ञता का भाव जिन्होंने भगवान की शिक्षाओं को संजोकर रखा।
अरण्य संघाराम में इस अवसर पर चार दिन (१० से १३ जुलाई तक) का विशेष कार्यक्रम आयोजित किया गया। सभी उपस्थितगण – अतिथि, गाँव–वासी और संघ मिलकर प्रातः कालीन ध्यान सत्र में, वर्षा में कीचड़ भरे मार्ग से गुजरते हुए भिक्षाटन और चेतन मन से रोजाना की दिनचर्या में शामिल हुए। और क्योंकि यह उपोसथ का दिन भी था, इसलिए गृहस्थ अथितियों को पातिमोक्ख का पाठ सुनने का अवसर भी प्राप्त हुआ। पातिमोक्ख भिक्षुओं के लिए एक सर्वकालिक नियमावली है जिसको भगवान बुद्ध के समय से यथावत संजोकर रखा गया है।
शाम के समय, धम्म–कक्ष बौद्ध शिक्षाओं के सामूहिक पाठ और धर्म के विवेचन से जीवंत हो उठा। और एक विशेष पहल के साथ अरण्य संघाराम में उपस्थित संघ ने धर्म की शिक्षाओं को बढ़ावा देने के लिए भगवान् बुद्ध की शिक्षाओं पर आधारित एक प्रश्नोत्तरी का आयोजन किया। और इस बार भिक्षुओं ने गृहस्थों से प्रश्न पूछे । प्रश्नों के विषय भगवान बुद्ध के जीवन से लेकर कुछ विशेष सुत्तों और थाई अरण्य परम्परा के बौद्ध विहार वाट पाह नानाचात में रहने वाले आचार्यों से संबंधित थे। और यह कार्यक्रम कुछ ग़लत सीखे हुए तथ्यों को छोड़ने का और सही तथ्यों को नए सिरे से मुदिता और चिन्तन से सीखने का तरीका बन गया, जिसने अपने आप को जांचने का एक नया रास्ता दिया ।

मनन और वंदन की एक संध्या
मध्य–रात्रि में, इस दिन का समापन (श्रोताओं के) मन को अंतर्मुखी करने के लिए, धम्मचक्क पवत्तन सुत्त के पालि, हिंदी और अंग्रेजी में पाठ के साथ हुआ।
🌧️ एकांतवास का समय : वर्षावास में प्रवेश
सजग पदचिन्ह अरण्य संघाराम में वर्षा-वास का संकेत देते हुए
अगले दिन, वर्षावास औपचारिक रूप से आरम्भ हुआ | इसके साथ विहार में रहने वाले भिक्षुओं ने यह घोषणा की, कि वर्षा के तीन महीनों के लिए वे विहार की चारदीवारी के अन्दर ही रहेंगे | यह परम्परा भगवान् बुद्ध के समय से चली आ रही है | संघ के सदस्यों ने कई प्रकार से अपने अभ्यास की गहराई में जाने का अधिष्ठान लिया, चाहे वह बैठ कर ध्यान करने से सम्बंधित हो, या चलते हुए ध्यान से संबंधित, या फिर सुत्तों के पाठ के अभ्यास से सम्बंधित हो |
संघ की निष्ठा से प्रेरित हो कर कुछ गृहस्थों ने भी यह अधिष्ठान लिए कि वे ज़ूम के ज़रिये सामूहिक कार्यक्रम वाले समूह के साथ भगवान् बुद्ध के महासत्तिपट्ठान सुत्त का गहराई से अध्ययन और उसके अनुसार अभ्यास करेंगे |
इसके अतिरिक्त विहार के निर्देशों के अनुसार आगंतुकों को अपने अभ्यास में गहराई लाने के लिए यहाँ रहते हुए आठ शीलों का पालन करने के लिए आमंत्रित किया जा रहा है | इसमें विशेषकर अपने फोन के प्रयोग को सीमित करने का निर्देश है | यह अब अरण्य संघाराम में आगंतुकों के लिए दिशा-निर्देशों का नियमित हिस्सा बन गया है |
🏡 परम्परा को आगे बढ़ाना: गाँव-वासियों के साथ गुरु पूर्णिमा का उत्सव
रामपुर गैन्दा के ग्रामवासियों के साथ सृजन और आनंद
रविवार, जुलाई १३ को, जब कार्यक्रम का अंतिम दिन था, संघाराम विहार द्वारा रामपुर गेंदा गाँव के वासियों के लिए एक विशेष समारोह का आयोजन किया गया | धम्म-कक्ष ने रंगों और रचनात्मकता के एक पुण्य-स्थान का रूप ले लिया।
बच्चों ने छोटे-छोटे समूहों में बैठ कर कापियों में रंगों से भगवान् बुद्ध का, आचार्य चाह का और जंगल में पेड़ों के बीचों-बीच जैसे पनाह लिए हुए कुटियों के चित्र बनाए | कुछ ने धम्मचक्क का चित्र बनाया तो किसी ने शांति और शरण की अपनी कल्पना को चित्रित किया |
बड़ों ने भी इस काम में हिस्सा लिया – कुछ ने संकोच करते हुए अपने चित्रों की भेंट दी, जबकि अन्य लोग श्रद्धापूर्वक शांति से बैठे हुए सब देखते रहे। हँसी-मज़ाक भी हो रहा था, लेकिन वातावरण में एक गहराई थी |
आचार्य गुणकरो ने अपने भिक्षु जीवन की यात्रा का मार्मिक विवरण दिया | उनके वक्तव्य ने कई दिलों को छू लिया, और न केवल एक प्रेरणा के स्त्रोत के रूप में बल्कि गाँव-वासियों को याद दिलाते हुए कि धम्म किसी से भी बहुत दूर नहीं है | जो लोग अंतर्मुखी होते हैं, उनमें धम्म का वास है, चाहे उसकी अभिव्यक्ति साधारण रूप में ही क्यों न हो | इसके बाद इस दिन के महत्व के ऊपर कुछ स्लाइड्स को प्रोजेक्टर के माध्यम से प्रदर्शित किया गया |
🎨 धम्म के रंग: बच्चे, कला और जिज्ञासा
न्हें हाथ, उजले रंग और शांतिपूर्ण आनंद के क्षण
औपचारिक कार्यक्रमों के अलावा भी, बच्चों का विहार में स्वागत किया जाता है | कई बार, नन्हे आगन्तुक कौतूहल के साथ आते हैं और उन्हें रंग करने के लिए कागज़ दिए जाते हैं, जिसमें जातक कथाओं से सम्बंधित चित्र होते हैं या धम्मचक्र का चित्र होता है या किसी जंगल का दृश्य होता है |
रंगीन पेन्सिलों से कथाएँ जीवंत हो जाती हैं और नन्हें-मुन्नों की रुचि को एक उद्देश्य प्रदान कर उसे साकार करती हैं |
🌱 भूमि की सुरक्षा और उसको कटाव से बचाना
वर्षा जल संरक्षण में सहायक पत्थर की दीवारें और चेक डैम
जो काम भूमि को कटाव से बचाने के लिए शुरू हुआ था, उसे वर्षावास के समय में रोक दिया गया है, क्योंकि मई से अब तक इस काम में काफी संतोषजनक प्रगति हुई है | मिट्टीरोध बाँध और गेबियन दीवार (पत्थर और जाली से बनी दीवार) बनाये जा चुके हैं | नाले के दोनों तरफ भी पत्थर लगा दिए गए हैं | मिट्टी के कटाव को रोकने के लिए और भूमि में जल का रिसाव बढ़ाने हेतु बहते हुए पानी को धीमा करने के लिए किये गए इन सब प्रयासों का असर अभी से दिखने लगा है | पत्थर से बनी ये रूपरेखाएँ उस स्थान को एक सुन्दर आकार तो देती ही हैं, साथ ही साथ प्राकृतिक रूप से धीमे-धीमे होने वाली पौधों की उपज को सहारा देती हैं, जिससे विहार के चारों ओर नवीनीकरण का आभास हो रहा है | धीरे-धीरे, ये दीवारें और नाले ऐसे नुक्कड़ बना रहे हैं जहाँ हवा में ठंडक है, पैरों तले नरम भूमि है और जहाँ चारों ओर का दृश्य प्राकृतिक सौंदर्य को ओढ़े हुए है |
पत्थर के निर्माण कार्य के अतिरिक्त, भूमि के पुनरुत्थान के लिए विहार की ज़मीन पर बहुत से पेड़, मिट्टी को बाँधने वाली झाड़ियाँ और घास लगाए गए हैं
इन स्थानों में स्थिरता का आभास होता है, जैसे प्रकृति स्वयं चिंतन के लिए कुछ पल रुक गई हो |
🍂 आगे के लिए योजना: ऐतिहासिक “कठिन” उत्सव की तैयारी

वर्षा की शांति में अरण्य संघाराम
वर्षावास जब चल रहा है तो उसकी समाप्ति के उत्सव की ओर ध्यान जाता है | इस उत्सव को “कठिन” समारोह के नाम से जाना जाता है । थाईलैंड से लुआंग पोर लियेम और अजान केवली अन्य भिक्षुओं के साथ इस समारोह में भाग लेकर इसकी शोभा बढ़ाएंगे। अरण्य संघाराम के लिए यह एक ऐतिहासिक समय होगा जब कई पीढ़ियों के भिक्षु और गृहस्थ एकत्रित होंगे | इस समय यह विचार मन में आ रहा है, कि आज जिन बीजों को बोकर सींचा जा रहा है, कल वही फले-फूलेंगे | विवरण यहाँ देखें: Kathina ceremony with Luang Por Liem
जुलाई से अब अगस्त आ गया है और ऐसे समय में यह बौद्ध विहार जैसे वन के ह्रदय में बसा हुआ है | उत्तर भारत में अनुभव किये जाने वाले वर्षा के बाद के मौसम के लिए विहार के वासी अपनी तैयारी कर रहे हैं | यहाँ की शरद ऋतु भी अनोखी है: किसी-किसी दिन तो सुखद हवा चलती है, किसी-किसी दिन, बूँदा-बांदी हो जाती है और कुछ दिन तो बहुत गर्मी और उमस रहती है |
जुलाई अपने साथ केवल वर्षा ही नहीं लाई उसके साथ बहुत कुछ आया | इस महीने में अंतर्मुखी होने की ऋतु का शुभारम्भ हुआ | वर्षावास में गहन ध्यान के लिए भगवान् बुद्ध द्वारा दिए गए प्रोत्साहन से प्रेरित हो कर अरण्य संघाराम ने भी वर्षावास के समय को विवेचन, एकांतवास और धम्म के पथ पर प्रगति के लिए अपना लिया है |
अरण्य संघाराम में आने के अथवा दान देने के इच्छुक लोगों के लिए निर्देश
🙏आगंतुकों के लिए: वर्षावास की अवधि में, अर्थात १२ जुलाई से ७ अक्टूबर तक, अरण्य संघाराम में कोई औपचारिक कार्यक्रम नहीं होगा | लेकिन विहार में सामान्य दिनचर्या चलती रहेगी | इस समय वर्षा की बूँदों से शीतल हुए इस विहार के शांत वातावरण का भाग बनने के लिए हम आगंतुकों का सस्नेह स्वागत करते हैं | विहार की ज़मीन पर कुछ समय पहले बड़ी संख्या में जो पौधे लगाए गए थे, उनके संरक्षण और पोषण के लिए भी यह समय अति उत्तम है |
संघाराम में आने के लिए, यहाँ क्लिक करें : अरण्य संघाराम में आने के लिए
💛 दानार्थ: अरण्य संघाराम में अभी पाँच भिक्षुओं का आवास है और देश भर से कई आगंतुकों की आवाजाही रहती है | अरण्य संघाराम अब बड़ा रूप ले रहा है | इस विहार के रख-रखाव और विकास में आप तीन प्रकार से भागीदार बन सकते हैं:
- मासिक परिचालन (विहार की सामान्य आवश्यकताओं, रख-रखाव और अन्य ज़रूरतों के लिए प्रति माह लगभग 1.25 से 1.5 लाख रुपये का खर्चा आता है)
- ज़मीन की खरीद और कल्याणमित्र भवन के निर्माण में हुए खर्चे में योगदान (इस कार्य में 2.71 करोड़ रुपये लगे जो शुभचिंतकों ने काम के समय पर पूरा होने हेतु एक ऋण के रूप में दिए | इस महापुण्य में भागीदारी पुण्यार्जन में एक शुभ अवसर है |)
- विकास की परियोजनाएं (समय-समय पर, विशेष परियोजनाओं के माध्यम से विहार में सुविधाओं का विकास किया जा रहा है | जुलाई में निम्नलिखित परियोजनाओं का काम लिया गया – शौचालयों और शयनागार में हवा की आवाजाही में सुधार, चारदीवारी की मरम्मत, अतिथिगृह के लिए बिजली के इन्वर्टर की खरीद, रसोईघर में भंडारण की जगह | कुल मिला कर इन सब में 219,200 रुपये का खर्चा आया |)अतः सभी उपासकों और उपासिकाओं के लिए विहार के रख-रखाव, सुरक्षा और विकास में योगदान देने का एक निरंतर अवसर है और इसके अलावा, “ज़मीन की खरीद और कल्याणमित्र भवन के निर्माण” के पुण्य कार्यों के लिए वर्तमान ऋण के भुगतान में भागीदारी का भी सुअवसर है |
आपका योगदान धम्म के इस अभ्यारण्य (सैंक्चुअरी) के रख-रखाव ,सुरक्षा और विकास में बहुत सहायक होगा |
अधिक जानकारी के लिए यहाँ क्लिक करें: दान के लिए जानकारी
हर भेंट दीर्घकालिक पुण्य कार्य है |
सामग्री सौजन्य: याशिका पोखरियाल | फोटो श्रेय: विविध